तेईस मार्च

23 मार्च... अब तो सालों से ऐसा नहीं हुआ कि इसके आस-पास की किसी तारीख का ज़िक्र हो... और 23 मार्च ध्यान में ना आये. कई बार तो मार्च के महीने का नाम सुनने पर ही ये दिन याद हो आता है.

जबसे बचपन में ये तारीख सुनी है, तो ज़ेहन में बैठ गई है. याद रहता है क्योंकि इस दिन तीन नौजवानों ने अपने देश और समाज के लिए अपना सर्वोच्च न्यौछावर कर दिया था. आप समझ ही गए होंगे... भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की बात हो रही है.

इसी दिन साल 1931 में इन तीन युवकों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी, जिनके सम्मान में 23 मार्च को शहीद दिवस भी होता है (हालांकि इनकी फांसी के लिए 24 मार्च 1931 की तारीख तय थी, लेकिन विरोध के डर से प्रशासन ने समय से पहले ही बिना बताए इन्हें सज़ा दे दी थी). फांसी के समय इन तीनों की उम्र भी करीब-करीब 23 साल ही थी.

जब स्कूल में पहली बार इन हस्तियों की ये कहानी सुनी थी, तो गहरा असर हुआ था. कोई देश की आज़ादी के लिए अपनी जान गंवाने को तैयार था, आखिर ऐसा क्या था उस आज़ादी में? फिर इतने बेखौफ और रोमांचक अंदाज में अपनी मौत के लिए तैयार रहना कोई मज़ाक तो रहा नहीं होगा. तो बेशक ये सब सोच-विचारकर एक गर्व और धन्यवाद का भाव तो आता ही था. उसपर केवल 23 साल की उम्र में ये कर गुज़रना तो और भी ज्यादा सोचने पर मजबूर करने वाला था. हालांकि 23 साल की उम्र तब बहुत लगती थी. लेकिन तब भी इतना तो पता था कि 23 कोई मरने की उम्र तो नहीं होती. हमारे आस पास कितने ही लोग हैं जो 23 साल से कहीं ज्यादा उम्र के हैं, उनका तो मरने का मन नहीं करता. मेरे दादाजी तो 80 से भी ज्यादा साल के हो गए थे, लेकिन उनसे जब मैं पूछता था कि आपका जीने से मन भरा क्या... तो वो साफ मना कर देते थे.

ऐसे में कोई 23 की उम्र में खुशी-खुशी हमारी आज़ादी के लिए जान देकर गया है, तो उसे कोई कैसे ना याद करे? फिल्मों और हरियाणवी रागनी से भी भगत सिंह के किस्से जानने को मिले. बहुत लोगों को शायद पता नहीं होगा, लेकिन हरियाणवी रागनी में देशभक्ति और धर्म को लेकर भी अच्छा खासा लिखा गया है.

फिर भगत सिंह के तो फोटो और पेंटिंग भी मूछों-टोपी में बहुत कूल लगा करते थे (आज भी लगते हैं). भगत सिंह के बचपन का एक किस्सा और है कि उसने खेत में अपने पिता से पूछा था कि क्या हम पौधों की तरह खेत में बंदूकें नहीं बो सकते.. जिनसे हम अंग्रेजों से लड़ सकें. एक छोटे से बच्चे को इन बातों की इतनी फिक्र क्यूं थी? हमें तो कोई ऐसी फिक्र नहीं है. आखिर इन सब बातों का एक युवा मन पर असर क्यों ना होता?

फिर थोड़ा बड़ा होकर भगत सिंह के कुछ विचार भी जानने को मिले, जिनसे उनके लिए आदर और बढ़ गया. ऐसे तो दुनिया में और भी बहुत लोगों ने अपने लोगों के लिए कुर्बानियां दी हैं, पर जब इस बलिदान के पीछे भगत सिंह के तर्क को जाना तो और भी सोचने पर मजबूर हुआ. कुछ लोग मौत के बाद किसी स्वर्ग या किसी दूसरे पवित्र कहे जाने वाले कारण के लिए खुद को मिटाने का फैसला कर सकते हैं. लेकिन भगत सिंह ऐसे बिल्कुल नहीं हैं, बल्कि कोई अगर ऐसा करे तो उसपर स्वार्थी होने का आरोप लग सकता है, कि उसका सर्वस्व त्यागने की भावना भी किसी लालच से पैदा हो रही है.

लेकिन भगत सिंह ने साफ लिखा है कि उनका मौत के बाद किसी दुनिया में विश्वास नहीं है और वो मानते थे कि एक बार उनकी सांस रुकी, तो फिर उसके बाद उनके शरीर या आत्मा का कहीं कोई संपर्क नहीं बचेगा. भगत सिंह ने इतने कठिन फैसले को थोड़ा सा भी आसान बनाने से साफ इंकार कर दिया. उन्होंने मरने के बाद किसी दूसरे जीवन या दैवीय शक्ति में विश्वास को पूरी तरह नकार दिया था.

कोई कह सकता है कि आज़ादी की आवाज को बुलंद करने के अलावा उन्हें प्रसिद्धि या मरने के बाद की glory का कोई लालच रहा हो. हालांकि एक इतने महान काम में ऐसे नुक्स निकालना कैसे सही हो सकता है. लेकिन एक पल के लिए अगर इस बात को सच मान लें, तो भी इस तरह के लालच में गलत क्या है?

आखिर समाज की भलाई के लिए चल रहे एक विशाल यज्ञ में बिना किसी तुच्छ स्वार्थ के प्राणों की आहुति देना अगर महानता नहीं है, तो फिर इस लफ्ज़ के मायने क्या हैं. ऐसे तो 23 से और भी कम उम्र में लड़कों ने देश-समाज के लिए अपनी जान की बाजी लगाई है. पर इस फैसले के पीछे भगत सिंह की जागरूकता और उनके तर्क ने इस बलिदान को अमिट बना दिया. और भी कई क्रांतिकारी उनकी तरह अपनी मौत को लेकर बेहद तार्किक रहे होंगे, लेकिन शायद भगत सिंह की प्रसिद्धि ने भी उनको यादगार बनाए रखने में भूमिका निभाई.

इंसानों के हजारों साल के इतिहास में आखिर कितने लोगों ने भगत सिंह जैसा जागरूक बलिदान दिया होगा? यही वजह है कि इस तरीके से अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले इस क्रांतिकारी के आगे नतमस्तक होने के अलावा और कुछ नहीं सूझता.

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले

वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशां होगा।

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